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Baglatd

पञ्जर स्तोत्रम्

श्री शिव उवाच

विनियोगः

अथ पञ्जर स्तोत्रम् ॐ अस्य श्रीमद् बगलामुखी पीताम्बरा पञ्जररूप स्तोत्र मन्त्रस्य भगवान नारद ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, जगद्वश्यकरी श्री पीताम्बरा बगलामुखी देवता, हल्लीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, क्लीं कीलकं मम परसैन्य मन्त्र-तन्त्र- यन्त्रदि कृत्य क्षयार्थं श्री पीताम्बरा बगलामुखी देवता प्रीत्यर्थे च जपे विनियोगः ।

न्यास

योनि मुद्रा से प्रणाम कर पंजर न्यास करे :-

ऋष्यादि-न्यास भगवान नारद ऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप छन्दसे नमः मुखे। जगद्वश्यकरी श्री पीताम्बरा बगलामुखी देवतायै नमः हृदये। ह्ल्रीं बीजाय नमः दक्षिणस्तने । स्वाहा शक्तिये नमः वामस्तने । क्लीं कीलकाय नमः नाभौ ।

करन्यास त्वां अंगुष्ठाभ्यां नमः। हलीं तर्जनीभ्यां स्वाहा । हलूं मध्यमाभ्यां वषट् । अनामिकाभ्यां हूं। हलौं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । हलं करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् ।

अंगन्यास हां हृदयाय नमः | हलीं शिरसे स्वाहा । हलूं शिखायै वषट् । लैं कवचाय हुं । हलौं नेत्रत्रयाय वौषट् । हलं अस्त्रय फट् ।

व्यापक न्यास ॐ ह्ल्रींअंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ बगलामुखि तर्जनीभ्यां स्वाहा । ॐ सर्वदुष्टानां मध्यमाभ्यां वषट् । ॐ वाचं मुखं पदं स्तम्भय अनामिकाभ्यां हूं। ॐ जिह्नां कीलय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । ॐ बुद्धिं विनाशय हल्रीं ॐ स्वाहा करतल कर पृष्ठाभ्यां फट् ।

ध्यान

मध्ये सुधाब्धि-मणि- मण्डप रत्नवेद्यां, सिंहासनों परिगतां परिपीतवर्णाम् । पीताम्बराभरण-माल्य-विभूषितांगी, देव स्मरामि धृत-मुद्गर- वैरि-जिह्नां ।

निमिलिखित रूप से मानसिक कल्पना करे:-

श्री पीताम्बरायै नमः लं पृथिव्यात्मकं गन्धं परिकल्पयामि ।
श्री पीताम्बरायै नमः हं आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि ।
श्री पीताम्बरायै नमः यं वायव्यात्मकं धूपं परिकल्पयामि ।
श्री पीताम्बरायै नमः रं अग्निआत्मकं दिपं परिकल्पयामि ।
श्री पीताम्बरायै नमः वं अमृतात्मकं नैवेद्यं परिकल्पयामि ।
श्री पीताम्बरायै नमः सं सर्वात्मकं तम्बुलम परिकल्पयामि ।

पञ्जर स्तोत्र

पञ्जरं तत्प्रवक्ष्यामि देव्याः पापप्रणाशनम् । यं प्रविश्य न बाधन्ते बाणैरपि नराः क्वचित ॥१॥

ॐ ऐं ह्ल्रीं श्रीं श्रीमत् पीताम्बरा देवी, बगला बुद्धि-वर्द्धिनी ।
पातु मामनिशं साक्षात्, सहस्रार्क-समद्युति ॥२॥

ॐ ऐं ह्ल्रीं श्रीं शिखादि-पाद- पर्यन्तं वज्रपञ्जर-धारिणी ।
ब्रह्मास्त्र-संज्ञा या देवी, पीताम्बरा-विभूषिता ॥३॥

ॐ ऐं ह्ल्रीं श्रीं श्री बगला यवत्वत्र, चोर्ध्व-भागं महेश्वरी ।
कामांकुशाकला पातु, बगला शास्त्र बोधिनी ॥४॥

ॐ ऐं ह्ल्रीं श्रीं पीताम्बरा सहस्राक्षा ललाटं कामितार्थदा ।
पातु मां बगला नित्यं, पीताम्बर सुधारिणी ॥५॥

ॐ ऐं ह्ल्रीं श्रीं कर्णयोश्चैव युग-पदति-रत्न प्रपूजिता ।
पातु मां बगला देवी, नासिकां मे गुणाकर ॥६॥

ॐ ऐं ह्ल्रीं श्रीं पीत-पुष्पैः पीत वस्त्रैः पूजिता वेददायिनी ।
पातु मां बगला नित्यं, ब्रह्म-विष्णवादि सेविता ॥७॥

ॐ ऐं ह्ल्रीं श्रीं पीताम्बरा प्रसन्नास्या, नेत्रयोर्युग-पद्भुवां ।
पातु मां बगला नित्यं, बलदा पीत वस्त्रधृक् ॥८॥

ॐ ऐं ह्ल्रीं श्रीं अधरोष्ठौ तथा दन्तान्, जिह्वां च मुखगां मम ।
पातु मां बगला देवी, पीताम्बर सुधारिणी ॥९॥

ॐ ऐं ह्ल्रीं श्रीं गले हस्ते तथा वाहयोः, युगपद् बुद्धिदा सताम् ।
पातु मां बगला देवी, दिव्य खगनुलेपना ॥१०॥

ॐ ऐं ह्ल्रीं श्रीं हृदये च स्तनौ नाभौ, करावपि कृशोदरी ।
पातु मां बगला नित्यं, पीत वस्त्र घनावृता ॥११॥

जंघयां च तथा चौर्वोः गुल्फयोश्चाति-वेगिनी । 

अनुक्तमपि यत् स्थानं, त्वक्-केश-नख-लोमकम् ॥१२॥

असृघु मांस तथाऽस्थीनी, सन्धयश्चापि मे परा । 

ताः सर्वाः बगला देवी, रक्षेन्मे च मनोहरा ॥१३॥

॥ इति परम रहस्याति रहस्ये पीताम्बरा पञ्जर स्तोत्रम् ॥


पंजर स्त्रोत का महत्व:-

  • बेहद प्रभावी वा शीघ्र लाभकारी हुआ करता है।
  • साधक के घोर दारिद्र्य का नाश करता है।
  • इसके पाठ से विपछी की बुद्धि स्तंभित होती है।
  • प्रातः और सायं इसका पाठ करने से शत्रु को बहुत विकलता होती है।
  • साधक के प्रति किये गए अभिचारो का छय होता है।
  • पंजर का जप और पाठ करने वाले साधक प्रत्येक छेत्र में सफलता का सोपान करता है।
  • अरिदल साधक को मूक होकर देखते रह जाते है।

नोट: १००० पाठ सिद्धि प्राप्त करने के लिए पहले करे उसके बाद १०० पाठ संकल्प लेकर कार्य सिद्धि के लिए अनुष्ठान करे पूर्ण परीक्षित है।

|| जय माँ बगलामुखी ||

टी.डी. सिंह जी

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मंत्र जाप से पहले ध्यान का महत्व मंत्रो के पूर्व “ध्यान” लिखा रहता है, जिसे साधक एक बार पढ़ कर जप करने लगते है। लिखा भी रहता है ध्यान पूर्वक जप करे। अब प्रशन उठता है कैसे ध्यान पूर्वक जप करे मूलतः ध्यान संस्कृत भाषा में लिखा रहता है अतः बहुधा साधक उसके अर्थ ही नही समझते फिर ध्यान करने का प्रश्न ही नही उठता। बिना ध्यान के सिद्ध मंत्र भी गूंगा होता है उसमें मंत्र सिद्ध का कुछ भी प्रकाश रहता। “ध्यान” के अनुसार चिन्तन करते हुए मंत्र जप करते है। अभ्यास के दृढ़ होने पर ही निखिल पुरुषार्थ की सिद्धि होती है। श्री बगलामुखी का मुख्य ध्यान सौवर्णासन संस्थिता त्रिनयनां पितांशु कोल्लासिनी, हेमा भगं रुचिं शशांक मुकुटां सच्चम्पक

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माता बगलामुखि ज्ञान-विज्ञान की सीमा से परे, भाषा – जाति के बन्धन से मुक्त, ब्रह्माण्ड की ऐसी निरविशय, भूमा और महा विराट् चिन्मय शक्ति है, जो सदैव श्रद्धा-भक्ति और कर्म के वशीभूत होती है। इनके मंत्रों में अपार शक्ति छिपी है। मंत्र सिद्धि के लिए शास्त्रों में दो उपक्रम दिए हैं :- मंत्र – संस्कार मंत्र जप मंत्र संस्कार :- दस होते हैं, इन संस्कारों के बिना मंत्र अपनी शक्ति और सामर्थ्य नहीं प्राप्त कर सकता। 1. जनन संस्कार :- भोजपत्र पर गोरोचन, हल्दी के रस या पीले चन्दन से मातृका योनि बनावे, फिर ईशान कोण से मातृका वर्ण लिख कर पूर्ण करे व इस अंकित भोजपत्र को पीठ पर स्थापित कर के आवाहन-स्थापन व पंचोपचार विधि से बगलामुखि देवी

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